गौरव का ये क्षण कभी नहीं भूलेगा हिंदुस्तान
मेरे प्यारे राजीव भाई द्वारा लिखित आर्टिकल:-
*"देख के बुद्ध का मुस्कान, विस्मित हुआ जहान, गौरव का ये क्षण कभी नहीं भूलेगा हिंदुस्तान।"* आज के समाचार पत्रों में प्रकाशित।
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18 मई 1974 का दिन भारतीय इतिहास में बहुत ही बड़ी उपलब्धि का दिवस रहा है। इस उपलब्धि के बाद अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत एक मजबूत देश के तौर पर उभरा। उस समय टेलीविजन का उतना दौर नहीं था जितना कि आज है। लोग रेडियो पर समाचार संगीत या अन्य कार्यक्रम सुना करते थे।चाहे किसान हो,मजदूर हो उनके मनोरंजन के साधनों में रेडियो का महत्वपूर्ण स्थान था।
हम तुम, इक कमरे में बन्द हों और चाभी खो जाये... तेरे नैनों के भूल भुलैय्या में बॅबी खो जाये हम तुम......।बॉबी फ़िल्म का ये मशहुर गाना किसने नही सुना होगा। यही गाना उस दिन आकाशवाणी के दिल्ली केंद्र से बज रहा था।लोग इसका आनंद ले रहे थे। बिना किसी पूर्वनियत कार्यक्रम आकाशवाणी से उद्घोषणा होती है। एक महत्त्वपूर्ण प्रसारण की प्रतीक्षा करे।तब सुबह के नव बज रहे थे।लोगो की ध्यान पूरी तरह रेडियो की तरफ हो गया।लोग सोचने लगे कि क्या प्रसारण होने को हैं।
कुछ ही वर्ष पूर्व 1971 में भारत-पाक युद्ध हुआ था। जिसमे पाकिस्तान ने भारत के आगे घुटने टेक दिए थे और तब बांग्लादेश नाम का एक नया देश बना था। बावजूद इसके लोगों के मन मे तरह-तरह के ख्याल आना स्वाभाविक था। जब तक कि वो अगला प्रसारण जो कुछ ही सेकंड बाद था, उसे सुन न ले। और इन्हीं सोच के क्रम में रेडियो से अगली उद्घोषणा होती है-आज सुबह आठ बजकर पाँच मिनट पर भारत ने पश्चिमी भारत के एक अज्ञात स्थान पर शांतिपूर्ण कार्यो के लिए एक भूमिगत परमाणु परीक्षण किया हैं।और यह उद्घोषणा सुनने के बाद ही पूरे देश मे प्रसन्नता की लहर दौड़ गयीं।
18 मई 1974 को ही बुद्धपूर्णिमा था और इसी कारण वैज्ञानिकों ने इस परीक्षण का नाम स्माइलिंग बुद्धा अर्थात "मुस्कुराते हुए बुद्ध" नाम दिया।
सफल परीक्षण के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री इंदिरा गांधी ने कहा- संपूर्ण देश के लिए यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
वही तत्कालीन जनसंघ के नेता एवं भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी इस परीक्षण से हर्षित होकेर बोले-भारत के अणु-वैज्ञानिकों के प्रशंशा के लिए मुझे उचित शब्द नहीं मिल रहे हैं।
इस परीक्षण हेतु राजस्थान के जैसलमेर से कुछ दूरी पर पोखरण क्षेत्र का रेगिस्तान स्थल चुना गया।पास के ही मलका गांव के एक सूखे कुएं में इस परीक्षण को किया गया। सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी दुनिया के अन्य देशों को इसकी भनक तक नहीं लग पाई।भारत पहला ऐसा देश बना जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य ना होते हुए भी इस परीक्षण को किया। अगले दिन के सभी समाचारपत्रों के मुख्य पृष्ठ पर इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया। उस समय के समाचार-पत्र आर्यावर्त में इस खबर को प्रथम पृष्ठ पर मुख्य बिंदु के साथ इस प्रकार प्रकाशित किया गया-"छठे आणविक देश के रूप में विश्व के क्षितिज पर भारत का उदय।"
1945 में डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा ने उद्योगपति जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा के सहयोग से मुंबई में 'टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च' की स्थापना की। इसी प्रकार से धीरे-धीरे भारत का परमाणु सम्पन्न बने इस दिशा में कार्य का पहला कदम माना गया। 1948 में डॉक्टर भाभा ने भारतीय परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना की इसके साथ उन्होंने अंतरराष्ट्रीय परमाणु उर्जा मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व भी किया।
डॉक्टर भाभा संगीत में काफी रुचि रखते थे।उनकी मुलाकात कर्नाटक के टुमकुर में जन्मे भौतिक वैज्ञानिक डॉ राजा रमन्ना से होती हैं। डॉक्टर रमन्ना को भी संगीत बहुत प्रिय था।दोनों के मिलने से कई सफर आसान से होने लग गए। दोनों साथ काम करने लगे।एक बार रमन्ना जी इराक यात्रा पर गए थे उनकी मुलाकात वहां के तानाशाह सद्दाम हुसैन से हुई।वह तानाशाह रमन्ना जी के ज्ञान से वाकिफ था। सद्दाम ने रमन्ना जी से इराक के न्यूक्लियर प्रोग्राम की कमान संभालने की बात कही।पर उन्होने इसे ठुकरा दिया।सद्दाम ने पुनः कहा इसके लिए वो जो चाहे मुँहमाँगी कुछ भी कीमत ले सकते हैं। पर रमन्ना जी भारत के सच्ची देशभक्ति के आगे जरा भी नहीं झुके।हालांकि उन्हें इस काम को ठुकराने से डर जरूर हो गया था कि उनके साथ कभी भी, कुछ भी हो सकता है।उन्हें डर इतना तक हो गया था कि शायद वो कभी अपने देश भारत न लौट पाए वो उस रात काफी परेशान रहे।मौका पाते ही उन्होंने जल्दी ही टिकट बुक किया और भारत लौट आए।डॉ भाभा और रमन्ना का साथ काफी रंग लाते दिखा।
1962 में भारत-चीन युद्ध हुआ।1965 में भारत-पाक युद्ध हुआ। इसी समय चीन ने थर्मोन्यूक्लियर डिवाइस विकसित कर परमाणु शक्ति संपन्न देशों में अपना नाम दर्ज कर लिया था।
इसके बाद से ही भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा यह निरंतर माँग उठने लगा कि भारत को भी प्लूटोनियम एवं अन्य बम उपकरण को विकसित करने की आवश्यकता हैं।1965 में डॉ भाभा, ऑल इंडिया रेडियो से इतना तक घोषणा कर दिए थे कि अगर उन्हें छूट मिले तो भारत 18 महीनों में परमाणु बम बनाकर दिखा सकता है।
1966 में डॉ भाभा की एक विमान दुर्घटना में मौत हो गयी। इस दुर्घटना से अन्य लोगो को तो दुःख हुआ ही रमन्ना जी को काफी आघात पहुँचा।इसके बाद न्यूक्लियर बम प्रोग्राम का कमान उन्होंने खुद सम्भाला अर्थात उन्हें ही प्रमुख बनाया गया।
24 जनवरी 1966 को इंदिरा गांधी जी ने प्रधानमंत्री का पद संभाला। वे भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री बनी। वैज्ञानिकों की मांग सरकार से हमेशा की तरह जारी रही की भारत अन्य प्रकार का बम विकसित करें। परिणामस्वरूप इंदिराजी ने मौखिक इजाजत दे दी।इसके बाद प्रयास में जुटे रमन्ना जी के साथ अन्य 75 वैज्ञानिकों के टीम ने सात साल पहले से भी ज्यादा कठिन मेहनत किये।1972 में उनलोगों को दक्षता मिल गयी।इंदिरा जी के इजाजत के बाद 1974 में भारत ने दुनिया को चौका दिया। ये वो दौर था जब भारत-पाक दुश्मनी चरम पर थी।उस समय पाकिस्तान के साथ दुनिया के दो ताक़तवर देश अमेरिका और चीन खड़े थे।कठिन चुनौतियों को भारत ने स्वीकारा। भारत के आत्मविश्वास ने इन परिस्थितियों का डट के सामना किया और कर दिखाया।भारत के परमाणु परीक्षण में बहुत सारी अन्य और भी कई विषम परिस्थितियाँ आते रही।आांशिक परीक्षण निषेध संधि (पीटीबीटी) नाम के एक समझौते पर भारत का हस्ताक्षर था।कोई भी देश इस समझौते के तहत आसमान,समुंद्र,पानी में कोई परीक्षण नहीं कर सकता था।भारत ने इसमें भी अपनी बुद्धिमता का परिचय दिया और यह परीक्षण जमीन के अंदर किया।इतना ही नही भारत ने इस परीक्षण से पूर्व पर्यावरण और भौगोलिक परिस्थिति पर उसका कोई विपरीत प्रभाव न पड़े इसका भी ध्यान रखा था।
इस बम का व्यास1.25 मीटर था। साथ ही इसका वजन 1400 किलो था। 75 वैज्ञानिकों के टीम में भारत के महान वैज्ञानिक एवं भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ ए. पी.जे.अब्दुल कलाम भी शामिल थे । परीक्षण के समय आठ से दस किलोमीटर का जो क्षेत्र था वहां की धरती हिल गई थी। जिस सूखे कुएं में पहला परमाणु परीक्षण हुआ था वहां पर एक विशाल गड्ढा और उभरी हुई जमीन आज भी उन गौरव के पलों को बयां करती है।
भारत के इस परीक्षण के बाद अमेरिका नाराज हो गया और उसने भारत को परमाणु सामग्री के साथ इंजन की आपूर्ति रोक दी। इस बात की जानकारी रूस को मिली फ़िर रूस ने भारत की मदद की।
1998 में प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में पाँच भूमिगत परीक्षण 11 से 13 मई को हुआ। इन पाँच परीक्षणों में 45 किलोटन का फ्यूज़न परमाणु उपकरण शामिल था।
भारत ने इन परीक्षणों के बाद खुद को परमाणु सम्पन्न देश घोषित किया।इस मिशन का नाम 'ऑपरेशन शक्ति' रखा गया था।इस मिशन में अहम भूमिका निभाने वालों में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम शामिल थे।परीक्षण की सफलता के बाद उस समय ही वाजपेयी जी ने "जय जवान,जय किसान एवं जय विज्ञान" का नारा दिया।
संसद को सम्बोधित करते हुए पूरे विश्व को भी वाजपेयी जी ने स्पष्ट संदेश दिया कि-"ये भारत बदला हुआ भारत है, दुनिया से आंख मिलाकर और हाथ मिलाकर चलना चाहता है।किसी प्रतिबंध से झुकेगा नहीं और शांति और सुरक्षा के लिए परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करेगा।"
आज भी विश्व को चौकाते हुए हिंदुस्तान दिन-प्रतिदिन,नए-नए परीक्षणों की ओर अग्रसर है, नई कामयाबियाँ और नई ऊँचाइयाँ हासिल कर रहा हैं।पुरे देश को इस पर गर्व हैं।
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✍🏻 राजीव नंदन मिश्र (नन्हें)
सत्यनारायण-पार्वती भवन,
सत्यनारायण मिश्र स्ट्रीट,
गृह संख्या:-76, ग्राम व पोस्ट-सरना,
थाना:-शाहपुर,जिला:-भोजपुर
बिहार-802165
मोo:-7004235870






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